Myanmar rare minerals: म्यांमार में दुनिया का सबसे दुर्लभ खजाना, कब्जे के लिए अमेरिका-चीन में घातक लड़ाई, QUAD ने मारी एंट्री

Myanmar rare minerals: म्यांमार में दुनिया का सबसे दुर्लभ खजाना, कब्जे के लिए अमेरिका-चीन में घातक लड़ाई, QUAD ने मारी एंट्री

Myanmar rare minerals: वैश्विक महाशक्तियों के बीच अब वर्चस्व की लड़ाई सिर्फ व्यापार या सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं रही है, बल्कि यह सीधे दुनिया के सबसे दुर्लभ खनिजों पर कब्जे की जंग बन गई है। जैसे-जैसे अमेरिका और चीन के बीच दुश्मनी बढ़ रही है, इसका दायरा भी उन कमजोर राजनीतिक व्यवस्था वाले देशों तक फैल रहा है, जो अब जियो-पॉलिटिकल अखाड़ा बन चुके हैं।

इस नए पावर गेम का केंद्रबिंदु बनकर उभरा है म्यांमार। भारत, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के ट्राइजंक्शन पर स्थित यह देश, भारत के लिए दक्षिण-पूर्व एशिया का प्रवेश द्वार भी है, लेकिन आज यह दुनिया के सबसे मूल्यवान खनिजों के लिए नया जंग का मैदान बन चुका है। (Myanmar rare minerals) सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया जब QUAD यानी भारत, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान ने इस खेल में अपनी आक्रामक एंट्री मारी, जिससे चीन के लिए मुश्किलें खड़ी हो गई हैं।

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Myanmar rare minerals: गृहयुद्ध की आग में खनिज पर कब्जे की चाल

म्यांमार इस समय भीषण हिंसक गृहयुद्ध से जूझ रहा है। देश में कई हथियारबंद जातीय संगठन सक्रिय हैं और सेना (जुंटा) के खिलाफ लगातार लड़ रहे हैं। (Myanmar rare minerals) ऐसे नाजुक समय में, वैश्विक शक्तियां इस लड़ाई में घी डालने का काम कर रही हैं मकसद सिर्फ एक है: दुर्लभ खनिज संपदा पर कब्जा करना।

म्यांमार की उत्तरी सीमा पर दुनिया के तीसरे सबसे बड़े रेयर अर्थ डिपॉजिट मौजूद हैं। इनमें ‘डिस्प्रोसियम’ (Dysprosium) जैसा अति-दुर्लभ मिनरल भी शामिल है। (Myanmar rare minerals) यह ऐसा खनिज है जो आधुनिक दुनिया के लिए अत्यंत आवश्यक है इसका उपयोग प्रिसिजन-गाइडेड हथियारों, इलेक्ट्रिक गाड़ियों और एडवांस इलेक्ट्रॉनिक्स के निर्माण में होता है। स्पष्ट है, जिस देश का इस भंडार पर नियंत्रण होगा, वह लंबे समय तक दुनिया पर अपना वर्चस्व बनाए रखेगा, क्योंकि इससे ही वह अत्याधुनिक हथियार बना सकेगा और अपनी तकनीकी शक्ति का विस्तार कर पाएगा।

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चीन की मजबूत पकड़, अब लग रहा झटका

म्यांमार में साल 2021 में हुए सैन्य तख्तापलट के बाद चीन ने अपनी पकड़ बहुत मजबूत कर ली थी। पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए कड़े प्रतिबंधों ने म्यांमार की सेना को हथियारों की सप्लाई और आर्थिक मदद के लिए पूरी तरह से चीन पर निर्भर रहने के लिए मजबूर कर दिया था। (Myanmar rare minerals) बीजिंग ने इसका पूरा फायदा उठाया और म्यांमार के 80 प्रतिशत से ज्यादा जरूरी मिनरल एक्सपोर्ट पर कब्जा कर लिया, जिसे बिना प्रोसेस किए वह सीधे अपनी घरेलू यूनिट्स को ट्रांसफर कर रहा था।

लेकिन, अब स्थिति तेजी से बदल रही है। ‘कचिन इंडिपेंडेंस आर्मी’ (KIA) समेत कई ताकतवर जातीय विद्रोही समूहों ने सेना के खिलाफ बड़ी बढ़त हासिल कर ली है। इन समूहों ने न सिर्फ सेना को पीछे धकेला है, बल्कि चीन के लिए दुर्लभ खनिजों को निकालना भी मुश्किल कर दिया है। KIA ने चीनी गतिविधियों को रोकना शुरू कर दिया है, और इसी मौके का फायदा उठाकर अब अमेरिका की म्यांमार में एंट्री हो गई है।

चीन के प्रभुत्व को काउंटर करने के लिए, अमेरिकी प्रशासन ने म्यांमार की सेना से संपर्क बढ़ा दिए हैं और उन्हें कई तरह की राहतें दी हैं। (Myanmar rare minerals) इसके साथ ही, उत्तरी थाईलैंड के चियांग माई स्थित अमेरिकी कांसुलेट के रास्ते अमेरिकी खुफिया एजेंसियां काफी तेजी से म्यांमार में एक्टिव हो चुकी हैं। हालांकि अमेरिका के लिए यह रास्ता अभी भी आसान नहीं है, लेकिन उसने चीन के प्रभुत्व को कम से कम चोट पहुंचाना शुरू कर दिया है।

भारत बना इस पावर गेम का नया ‘प्लेयर’

अमेरिका के लिए भारत की मदद के बिना म्यांमार में अपनी पैठ बनाना लगभग असंभव है, और भारत इस जियो-पॉलिटिकल समीकरण में एक महत्वपूर्ण शक्ति बनकर उभरा है। भारत ने दुर्लभ खनिजों को निकालने के लिए अपनी टेक्नोलॉजी को एडवांस किया है, जिसका केंद्रबिंदु है ‘नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन 2025’। इस मिशन में विदेशी खदानों के अधिग्रहण, एडवांस प्रोसेसिंग ज़ोन और रिसर्च एंड डेवलपमेंट क्षमताओं का निर्माण शामिल है। भारत की सरकारी कंपनी KABIL (खनिज विदेश लिमिटेड) पहले ही अर्जेंटीना और ऑस्ट्रेलिया में खनिजों की खोजबीन कर रही है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने अब म्यांमार के कचिन राज्य में संभावित सहयोग के लिए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) और म्यांमार के मंत्रालयों के साथ तेज बातचीत शुरू कर दी है। QUAD के साझेदार ऑस्ट्रेलिया और जापान भी उत्तर-पूर्व भारत को इन खनिजों के लिए एक वैकल्पिक प्रोसेसिंग हब बनाने पर जोर दे रहे हैं। (Myanmar rare minerals) ऐसे में म्यांमार का पड़ोसी होना भारत को जबरदस्त फायदा देने वाला है, और विशेषज्ञों का मानना है कि म्यांमार अगले कुछ सालों तक दुनिया की सबसे बड़ी जियो-पॉलिटिकल जंग का गरम अखाड़ा बना रहेगा।

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