
चंद्रशेखर आजाद ने खेला ‘दलित कार्ड’! योगी के मंत्री असीम अरूण का किया समर्थन, यूपी सियासत में हलचल
कन्नौज जिले में आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान राज्य मंत्री असीम अरुण के साथ हुई कथित उपेक्षा ने प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है।
उत्तर प्रदेश के कन्नौज जिले में आयोजित एक सरकारी कार्यक्रम के दौरान राज्य मंत्री असीम अरुण के साथ हुई कथित उपेक्षा ने प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किए गए मंत्री को करीब 45 मिनट तक इंतजार करना पड़ा और अंततः उन्हें बिना कार्यक्रम में शामिल हुए ही लौटना पड़ा। इस घटना को लेकर विपक्ष ने सरकार और प्रशासनिक तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
नगीना से सांसद और आजाद समाज पार्टी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद ने इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया है। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए इसे सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सत्ता के भीतर गहराई से जमी ‘जातिगत मानसिकता’ का परिणाम बताया। उन्होंने कहा कि एक ऐसे व्यक्ति, जिसने भारतीय पुलिस सेवा (IPS) जैसे प्रतिष्ठित पद को छोड़कर राजनीति में प्रवेश किया और जिसे मुख्य अतिथि के तौर पर बुलाया गया, उसके साथ इस तरह का व्यवहार बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
बेबी रानी मौर्य के साथ हुई घटना का भी किया जिक्र
चंद्रशेखर आजाद ने आरोप लगाया कि मंत्री को किसी अन्य ‘विशिष्ट’ व्यक्ति के आने के इंतजार में बैठाए रखना और फिर बिना स्पष्ट जानकारी के उन्हें लौटने पर मजबूर करना, न केवल उनका व्यक्तिगत अपमान है बल्कि संवैधानिक पदों की गरिमा को भी ठेस पहुंचाने वाला है। उन्होंने इस घटना को आगरा में कैबिनेट मंत्री बेबी रानी मौर्य के साथ हुई घटना से भी जोड़ा, जहां एक किसान बैठक में अधिकारी समय पर नहीं पहुंचे थे, जिससे मंत्री को बैठक स्थगित करनी पड़ी थी।
इन दोनों घटनाओं का उल्लेख करते हुए चंद्रशेखर ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि जनप्रतिनिधियों के कार्यक्रमों में अधिकारी या तो समय पर नहीं पहुंचते या फिर उन्हें नजरअंदाज किया जाता है। उन्होंने सीधे तौर पर पूछा कि क्या कुछ चुनिंदा नौकरशाहों का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि वे निर्वाचित प्रतिनिधियों को भी महत्व नहीं दे रहे। उन्होंने सरकार के ‘रामराज्य’ के दावे पर भी तंज कसते हुए कहा कि अगर इस व्यवस्था में संवैधानिक पदों का सम्मान भी जाति के आधार पर तय हो रहा है, तो यह बेहद चिंताजनक है। उन्होंने दलित और पिछड़े समाज के लोगों को सचेत करते हुए कहा कि जब सरकार अपने ही समाज से आने वाले मंत्रियों को सम्मान नहीं दे पा रही है, तो आम जनता की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
इन दोनों घटनाओं का उल्लेख करते हुए चंद्रशेखर ने सवाल उठाया कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है कि जनप्रतिनिधियों के कार्यक्रमों में अधिकारी या तो समय पर नहीं पहुंचते या फिर उन्हें नजरअंदाज किया जाता है। उन्होंने सीधे तौर पर पूछा कि क्या कुछ चुनिंदा नौकरशाहों का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि वे निर्वाचित प्रतिनिधियों को भी महत्व नहीं दे रहे। उन्होंने सरकार के ‘रामराज्य’ के दावे पर भी तंज कसते हुए कहा कि अगर इस व्यवस्था में संवैधानिक पदों का सम्मान भी जाति के आधार पर तय हो रहा है, तो यह बेहद चिंताजनक है। उन्होंने दलित और पिछड़े समाज के लोगों को सचेत करते हुए कहा कि जब सरकार अपने ही समाज से आने वाले मंत्रियों को सम्मान नहीं दे पा रही है, तो आम जनता की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
