
लालू-नीतीश का मॉडल फिर चर्चा में: क्या जाति के सहारे तय होगा नया CM?
Bihar CM selection caste equation 2026: बिहार की सियासत के बारे में एक मशहूर कहावत है- “यहां वोट डाले नहीं जाते, बल्कि वोट बांटे जाते हैं।” 1990 के दशक से शुरू हुआ जातीय समीकरणों का यह खेल आज 2026 में भी उतना ही प्रासंगिक है। लालू यादव के ‘मंडल’ से लेकर नीतीश कुमार के ‘लव-कुश’ तक, बिहार की सत्ता की चाबी हमेशा जातियों के गुच्छे में ही छिपी रही है। अब जब नीतीश कुमार दिल्ली की राजनीति की ओर रुख कर रहे हैं और बिहार में नए मुख्यमंत्री के चयन की सुगबुगाहट तेज है, तो एक बार फिर सवाल खड़ा हो गया है- क्या योग्यता पर जाति भारी पड़ेगी?
लालू यादव: मंडल राजनीति के जनक और ‘M-Y’ का उदय
बिहार में जातीय गोलबंदी के असली सूत्रधार लालू प्रसाद यादव माने जाते हैं। 1990 में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिशें लागू कीं, तो लालू यादव ने इसे एक बड़े सियासी हथियार में बदल दिया। ‘भूराबाल साफ करो’ जैसे आक्रामक नारों के साथ उन्होंने पिछड़ों और दलितों को एक मंच पर खड़ा किया। इसी समीकरण के सहारे उन्होंने 15 साल तक बिहार पर राज किया। लालू ने ‘मुस्लिम-यादव’ (M-Y) का एक ऐसा अभेद्य किला बनाया, जिसे भेदना सालों तक नामुमकिन रहा। हालांकि, उन पर आरोप लगे कि उन्होंने दलितों और पिछड़ों के कल्याण के बजाय केवल अपने परिवार और खास बिरादरी को ही सत्ता के शीर्ष पर बिठाया।
नीतीश कुमार: ‘लव-कुश’ और पसमांदा कार्ड का नायाब प्रयोग
जब लालू के M-Y समीकरण से अन्य पिछड़ी और अति-पिछड़ी जातियां खुद को ठगा हुआ महसूस करने लगीं, तब नीतीश कुमार ने ‘लव-कुश’ (कुर्मी और कोइरी/कुशवाहा) समीकरण की बुनियाद रखी। 1994 से शुरू हुआ यह सफर नीतीश को सत्ता के शिखर तक ले गया। नीतीश ने राजनीति में नए प्रयोग किए। उन्होंने दलितों के भीतर ‘महादलित’ की श्रेणी बनाई और मुसलमानों के भीतर ‘पसमांदा’ (पिछड़े मुसलमान) समाज को अपनी ओर खींचा। यही कारण है कि उनकी अपनी जाति की आबादी महज 3-4 प्रतिशत होने के बावजूद, वे विभिन्न जातियों के ‘पॉकेट वोट बैंक’ के सहारे 20 साल तक मुख्यमंत्री बने रहे।
राष्ट्रीय दलों की नई रणनीति: क्या कांग्रेस-बीजेपी भी खेल रहीं जाति का दांव?
हैरानी की बात यह है कि विचारधारा की बात करने वाली राष्ट्रीय पार्टियां भी बिहार के इस जातीय दलदल से खुद को बचा नहीं पाईं। बीजेपी, जो कैडर आधारित राजनीति का दावा करती है, उसे भी बिहार में पिछड़ी जातियों के चेहरों को आगे करना पड़ा। वहीं, कांग्रेस ने तो अब अपना चोला ही बदल लिया है। सवर्ण वोटों की पारंपरिक राजनीति छोड़कर कांग्रेस अब पूरी तरह दलित, पिछड़े और मुस्लिम कार्ड पर खेल रही है। इसका ताजा उदाहरण बंगाल चुनाव में दिखा, जहां कांग्रेस ने अपने आधे से ज्यादा टिकट केवल मुस्लिम और दलित उम्मीदवारों को दिए हैं। बिहार में भी कांग्रेस अब ‘पिछड़ा प्रेम’ दिखाकर अपनी खोई जमीन तलाश रही है।
दरकती सियासत, पुराना दांव: क्या RJD को ‘M-Y’ ही दिलाएगा मजबूती?
आज भी तेजस्वी यादव और लालू यादव को उम्मीद है कि M-Y समीकरण उन्हें सत्ता दिलाएगा। लेकिन आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां कर रहे हैं। 2025 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी को महज 23 प्रतिशत वोट मिले, जबकि मुस्लिम और यादव की सम्मिलित आबादी करीब 31 प्रतिशत है। इसका सीधा मतलब है कि अब मुसलमान और यादव मतदाता भी पूरी तरह आरजेडी के साथ नहीं हैं। नीतीश कुमार ने इस वोट बैंक में बड़ी सेंधमारी की है, जिससे आरजेडी का यह पुराना किला अब दरकता हुआ नजर आ रहा है।
नीतीश का ‘मास्टरस्ट्रोक’: सम्राट चौधरी और कुश समीकरण का आशीर्वाद
जाते-जाते नीतीश कुमार ने एक ऐसा दांव चल दिया है जिसने बीजेपी को धर्मसंकट में डाल दिया है। खुद ‘लव’ (कुर्मी) समाज से आने वाले नीतीश ने सार्वजनिक रूप से ‘कुश’ (कुशवाहा) समाज के नेता सम्राट चौधरी को अपना आशीर्वाद दे दिया है। यह नीतीश की एक सोची-समझी चाल मानी जा रही है। अगर बीजेपी सम्राट चौधरी को सीएम नहीं बनाती है, तो उसे ‘लव-कुश’ समाज की नाराजगी झेलनी पड़ सकती है। नीतीश ने यह सुनिश्चित कर दिया है कि उनके जाने के बाद भी बिहार की सत्ता का केंद्र वही ‘जातीय समीकरण’ रहे, जिसे उन्होंने पिछले दो दशकों में सींचा है।
जाति ही बनेगी जीत की कुंजी?
बिहार के अगले मुख्यमंत्री के सेलेक्शन में प्रशासनिक क्षमता से कहीं ज्यादा उम्मीदवार की जाति और उसका सामाजिक आधार मायने रखेगा। सम्राट चौधरी, नित्यानंद राय या कोई और- जो भी कुर्सी पर बैठेगा, उसे बिहार के इस जटिल ‘कास्ट मैट्रिक्स’ को पार करना ही होगा। 2026 का चुनाव यह तय करेगा कि बिहार विकास के नाम पर वोट देगा या फिर से उन्हीं पुराने जातीय खांचों में सिमट कर रह जाएगा। फिलहाल, पटना की हवाओं में केवल एक ही गूंज है- “जाति न पूछो साधु की, पर नेता की जरूर पूछो।”
