Ujjwala Yojana Subsidy Cut: क्या महंगी होने वाली है रसोई? उज्ज्वला योजना में बड़े बदलाव से बढ़ी चिंता

Ujjwala Yojana Subsidy Cut: क्या महंगी होने वाली है रसोई? उज्ज्वला योजना में बड़े बदलाव से बढ़ी चिंता

Ujjwala Yojana Subsidy Cut: देश की करोड़ों महिलाओं और गरीब परिवारों के रसोई बजट से जुड़ी एक बेहद बड़ी और चौंकाने वाली खबर सामने आ रही है। केंद्र सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक ‘प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना’ को लेकर एक ऐसा नीतिगत बदलाव किया गया है, जिसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ने वाला है।

सरकार ने इस योजना के तहत मिलने वाले रियायती गैस सिलेंडरों की सालाना संख्या में भारी कटौती कर दी है। साल 2016 में जब इस योजना की भव्य शुरुआत हुई थी, तब हर परिवार को साल में 12 सिलेंडर देने का वादा किया गया था। लेकिन पिछले दस वर्षों के सफर में यह संख्या धीरे-धीरे कम होते हुए अब महज 4 सिलेंडर सालाना पर आकर सिमट गई है। इस नए फैसले से देश के 10 करोड़ से भी ज्यादा लाभार्थियों के बीच भारी हलचल मच गई है।

आखिर क्यों उठानी पड़ी कैंची

इस बड़ी कटौती के पीछे सरकार के खजाने पर पड़ रहा भारी वित्तीय बोझ सबसे मुख्य वजह माना जा रहा है। वर्तमान समय में जब कोई उज्ज्वला लाभार्थी गैस रीफिल करवाता है, तो सरकार की तरफ से 300 रुपये की सब्सिडी सीधे उसके बैंक खाते में ट्रांसफर की जाती है। इस राहत की शुरुआत मई 2022 में 200 रुपये से हुई थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 300 रुपये कर दिया गया था। लेकिन इसके साथ ही सिलेंडरों की संख्या पर भी कैंची चलती रही। अगस्त 2025 तक लाभार्थियों को साल में 9 सब्सिडी वाले सिलेंडर मिल रहे थे, जिसे अब जून 2026 में घटाकर सिर्फ 4 कर दिया गया है।

पेट्रोलियम मंत्रालय का तर्क है कि एक गैस सिलेंडर को तैयार करने में सरकार की लागत करीब 1600 रुपये आती है, जबकि गरीब परिवारों को सस्ता ईंधन देने के लिए सरकार प्रति सिलेंडर लगभग 1000 रुपये का भारी खर्च खुद उठाती है।

संसद में गूंजा उज्ज्वला का मुद्दा

इस योजना के विस्तार और लाभार्थियों से जुड़े कुछ तीखे सवाल हाल ही में सांसदों द्वारा लोकसभा में उठाए गए थे। संसद में पूछे गए इन सवालों का लिखित जवाब देते हुए केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने बताया कि मार्च 2026 तक देश के भीतर कुल 10.56 करोड़ गरीब परिवारों को मुफ्त गैस कनेक्शन बांटे जा चुके हैं। इनमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के परिवारों का है। उन्होंने यह भी जानकारी दी कि सरकारी प्रयासों के कारण प्रति परिवार गैस की औसत खपत में सुधार हुआ है।
साल 2021-22 में जहां एक परिवार साल में औसतन 3.68 सिलेंडर इस्तेमाल करता था, वहीं साल 2025-26 में यह आंकड़ा बढ़कर 4.80 सिलेंडर तक पहुंच गया है।

कई चरणों में पूरा हुआ मुफ्त कनेक्शन बांटने का अभियान

योजना के शुरुआती सफर को लेकर पेट्रोलियम राज्यमंत्री सुरेश गोपी ने भी संसद में अहम जानकारियां साझा की थीं। उन्होंने बताया कि देश के 8 करोड़ गरीब परिवारों तक रसोई गैस पहुंचाने का पहला बड़ा लक्ष्य सरकार ने सितंबर 2019 में ही हासिल कर लिया था। इसके बाद छूटे हुए परिवारों को जोड़ने के लिए अगस्त 2021 में ‘उज्ज्वला 2.0’ की शुरुआत की गई। इसके तहत पहले 1 करोड़, फिर 60 लाख और बाद में 75 लाख अतिरिक्त कनेक्शन देने के लक्ष्य तय समय से पहले पूरे किए गए। इस तरह लगातार चलते अभियानों के जरिए देश के कोने-कोने तक स्वच्छ ईंधन का जाल बिछाया गया।

खजाने पर भारी पड़ा 1.14 लाख करोड़ का खर्च

अगर इस योजना पर अब तक हुए कुल खर्च का पूरा बही-खाता देखा जाए, तो आंकड़े पूरी तरह से हैरान करने वाले हैं। सरकार ने मुफ्त कनेक्शन बांटने, उपभोक्ताओं के खातों में सीधी सब्सिडी भेजने और तेल कंपनियों के नुकसान की भरपाई करने में अब तक कम से कम 1,14,954 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि खर्च कर दी है।

अकेले पिछले पांच सालों में सिर्फ डायरेक्ट सब्सिडी के नाम पर 45 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा बांटे गए हैं। इसके अलावा सरकारी तेल कंपनियों को घाटे से उबारने के लिए भी हजारों करोड़ रुपये का मुआवजा दिया गया है। इतनी बड़ी रकम हर साल खर्च होने की वजह से ही सरकार अब इस योजना के दायरे को धीरे-धीरे सीमित करने पर मजबूर हुई है।

कम खपत को देखकर सरकार ने की कटौती?

इस पूरे मामले का एक तकनीकी पहलू यह भी है कि सरकार ने यह कटौती हवा में नहीं की है, बल्कि इसके पीछे उपभोक्ताओं का असल व्यवहार है। आंकड़ों के मुताबिक, भले ही कागजों पर 9 सिलेंडर तय थे, लेकिन देश का एक आम गरीब परिवार साल भर में औसतन 4 सिलेंडर ही भरवा पा रहा था। ऐसे में सरकार ने जनता की इसी जमीनी जरूरत और औसत खपत को आधार बनाकर सिलेंडरों का कोटा 4 तय कर दिया है। सरकार को उम्मीद है कि इस कदम से हर साल सब्सिडी के नाम पर खर्च होने वाले करोड़ों रुपये की बचत की जा सकेगी।

सरकार के सामने सिर्फ बजट की ही समस्या नहीं थी, बल्कि बड़ी संख्या में ऐसे खाते भी थे जो कनेक्शन लेकर पूरी तरह शांत बैठ गए थे। एक जांच में सामने आया कि देश में करीब 11.7 लाख कनेक्शनधारी ऐसे थे जिन्होंने पहली बार मुफ्त सिलेंडर मिलने के बाद दोबारा कभी अपनी एजेंसी का रुख ही नहीं किया।

इस गड़बड़ी से निपटने के लिए जनवरी 2025 में एक सख्त नियम लागू किया गया, जिसके तहत बड़े पैमाने पर ई-केवाईसी (e-KYC) अभियान चलाया गया। इस कड़े पहरे के कारण जहां लाखों लोगों ने दोबारा गैस भरवाना शुरू किया, वहीं करीब 21 हजार पूरी तरह से फर्जी पाए गए गैस कनेक्शनों को हमेशा के लिए रद्द कर दिया गया।

देश में रिकॉर्ड स्तर पर बढ़ी LPG की मांग

तमाम कटौतियों और विवादों के बीच इस योजना ने देश की सेहत सुधारने में एक बेहद क्रांतिकारी भूमिका निभाई है। सरकारी दावों के अनुसार, लकड़ी और उपलों के पारंपरिक चूल्हों से निकलने वाले खतरनाक धुएं से देश की करोड़ों महिलाओं को हमेशा के लिए मुक्ति मिली है, जिससे उनके स्वास्थ्य में बड़ा सुधार हुआ है।

इसके साथ ही देश में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कार्बन उत्सर्जन में भी भारी कमी दर्ज की गई है। सरकारी आंकड़े गवाह हैं कि साल 2014-15 में पूरे देश के भीतर एलपीजी की जो कुल खपत लगभग 17 हजार मीट्रिक टन थी, वह पिछले दस सालों में 81 प्रतिशत की भारी छलांग लगाकर 31 हजार मीट्रिक टन के पार पहुंच गई है। इसी तरह देश में घरेलू गैस उपभोक्ताओं का आंकड़ा भी 14 करोड़ से बढ़कर अब 32 करोड़ के पार जा चुका है।

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