
पृथ्वी दिवस विशेष: “सब मिलकर बचाएँ, तभी बचेगी धरती” – ज्ञानेन्द्र रावत का संदेश
Earth Day 2026 Special: पृथ्वी दिवस के अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार एवं पर्यावरणविद् ज्ञानेन्द्र रावत ने मानव और प्रकृति के रिश्ते पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने महात्मा गांधी के उस विचार को याद किया कि “धरती पर मानव की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं, लेकिन उसके लोभ के लिए नहीं।” आज यही असीमित लालच मानवता और प्रकृति के बीच टकराव का कारण बनता जा रहा है।
रावत के अनुसार, प्रकृति की लगातार अनदेखी ने धरती को असंतुलन के खतरनाक मोड़ पर ला खड़ा किया है। सुख-सुविधाओं की अंधी दौड़ और स्वार्थपूर्ण सोच ने पर्यावरण पर भारी दबाव डाला है। इसके परिणामस्वरूप प्राकृतिक संसाधनों का अत्यधिक दोहन हो रहा है और जीव-जंतुओं व वनस्पतियों की हजारों प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं। हालिया आंकड़े बताते हैं कि उपजाऊ जमीन लगातार घट रही है और करीब 40 प्रतिशत भूमि के बंजर होने का खतरा मंडरा रहा है। जलवायु परिवर्तन इस संकट की प्रमुख वजह बनकर उभरा है।
उन्होंने कहा कि धरती, जिसे हम ‘मां’ कहकर पूजते हैं, अपने कर्तव्यों का निर्वहन पूरी निष्ठा से कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हम अपने कर्तव्यों के प्रति उतने ही सजग हैं? धरती के गर्भ में अपार खनिज संपदा है, असंख्य वनस्पतियाँ हैं और अनगिनत जीव-जंतु यहां निवास करते हैं। जैन दर्शन के अनुसार पृथ्वी स्वयं एक जीव है और इसमें पृथ्वीकाय, अपकाय, तेजसकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय और त्रसकाय जैसे छह प्रकार के जीव-तत्व मौजूद हैं। ऐसे में सभी जीवों के प्रति अहिंसा और संरक्षण की भावना जरूरी हो जाती है, लेकिन विडंबना यह है कि सबसे बुद्धिमान प्राणी मनुष्य ही धरती को सबसे अधिक नुकसान पहुंचा रहा है।
इतिहास पर नजर डालें तो पृथ्वी लगभग साढ़े चार अरब वर्ष पुरानी है। समय के साथ प्राकृतिक परिवर्तन धीरे-धीरे होते रहे, लेकिन पिछले कुछ दशकों में बदलावों की रफ्तार ने वैज्ञानिकों को भी चिंतित कर दिया है। हिमयुग के अंत के बाद शुरू हुआ होलोसीन काल अब समाप्ति की ओर है और वर्तमान युग को ‘एंथ्रोपोसीन’ यानी मानव-निर्मित युग कहा जा रहा है, जिसमें प्रकृति पर मानव गतिविधियों का गहरा प्रभाव साफ दिखाई देता है।
बीते वर्षों में औद्योगिकीकरण, शहरीकरण, वैज्ञानिक प्रगति और बढ़ती आबादी ने संसाधनों पर दबाव बढ़ाया है। प्रदूषण और असंतुलित जीवनशैली ने पर्यावरण को गंभीर संकट में डाल दिया है। अनुमान है कि इस सदी के अंत तक विश्व की जनसंख्या 9 अरब के पार पहुंच सकती है, जिससे धरती पर दबाव और बढ़ेगा।
वैज्ञानिक शोध चेतावनी दे रहे हैं कि यदि वैश्विक तापमान इसी तरह बढ़ता रहा तो आने वाले वर्षों में भीषण प्राकृतिक आपदाएं देखने को मिल सकती हैं। समुद्र का तापमान बढ़ने से तूफान अधिक खतरनाक हो रहे हैं, बर्फ तेजी से पिघल रही है और समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। अंटार्कटिका में बर्फ पिघलने की गति कई गुना बढ़ चुकी है। विशेषज्ञों का मानना है कि इन सबके पीछे प्रमुख कारण मानवीय गतिविधियाँ ही हैं।
जलवायु परिवर्तन का असर विश्व धरोहरों पर भी दिखने लगा है। ताजमहल, धौलावीरा, पुरी का मंदिर, जैसलमेर किला, अजंता-एलोरा की गुफाएँ और दुनिया की कई अन्य ऐतिहासिक धरोहरें खतरे में हैं।
अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के अनुसार, पिछले 250 वर्षों में हुई मानवीय गतिविधियाँ इस पर्यावरणीय संकट के लिए 90 प्रतिशत तक जिम्मेदार हैं।
रावत ने 2009 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन में एक छात्रा द्वारा दी गई चेतावनी का जिक्र करते हुए कहा कि आज 16 साल बाद हालात और भी गंभीर हो चुके हैं। हिमालय की बर्फ पिघल रही है, ध्रुवीय जीव संकट में हैं और समुद्र का स्तर बढ़ता जा रहा है। ऐसे में यह सवाल और भी प्रासंगिक हो जाता है कि हम आने वाली पीढ़ियों को कैसी धरती सौंपेंगे।
उन्होंने अंत में कहा कि ग्लोबल वार्मिंग आज पूरी दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती है। ग्रीनहाउस गैसों के लगातार उत्सर्जन से मौसम चक्र बदल रहा है, फसल उत्पादन प्रभावित हो रहा है और समुद्र का पानी अम्लीय होता जा रहा है। यदि यही स्थिति बनी रही तो सदी के अंत तक समुद्री जीवों की 30 से 40 प्रतिशत प्रजातियाँ समाप्त हो सकती हैं।
स्पष्ट है कि धरती को बचाने की जिम्मेदारी हम सभी की है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो नुकसान की भरपाई असंभव हो जाएगी। इसलिए जरूरी है कि हम अपने व्यवहार में बदलाव लाएं और प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलें—क्योंकि जब धरती बचेगी, तभी मानवता बचेगी।
