West Bengal election 2026 : 29 अप्रैल वोटिंग, 4 मई नतीजे,क्या बदलेगा बंगाल का राजनीतिक इतिहास?

West Bengal election 2026 : 29 अप्रैल वोटिंग, 4 मई नतीजे,क्या बदलेगा बंगाल का राजनीतिक इतिहास?

West Bengal election 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति का मिजाज हमेशा से एकतरफा रहा है। यहां की जनता जिसे चुनती है, उसे छप्पर फाड़कर सीटें देती है और जिसे नकारती है, उसे दहाई के आंकड़ों में समेट देती है। चाहे वह कांग्रेस का शुरुआती दौर रहा हो, वामपंथियों का 34 साल का अजेय शासन या फिर ममता बनर्जी का 15 साल का ‘मां-माटी-मानुष’ का राज- बंगाल ने हमेशा प्रचंड बहुमत की सरकारें देखी हैं। लेकिन 29 अप्रैल 2026 को होने वाले दूसरे चरण के मतदान और 4 मई को आने वाले नतीजों से पहले एक बड़ा सवाल हवा में तैर रहा है: क्या इस बार मुख्य विपक्षी दल 100 सीटों के उस ‘जादुई आंकड़े’ को पार कर पाएगा, जिसे छूना पिछले सात दशकों से एक नामुमकिन ख्वाब बना हुआ है?

बंगाल में एकतरफा जनादेश की परंपरा, विपक्ष के लिए बड़ी चुनौती

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो एक हैरान करने वाला पैटर्न सामने आता है। साल 1952 से लेकर 2021 तक के चुनावी इतिहास में लगभग हर बार मुख्य विपक्षी दल 100 सीटों के नीचे ही सिमट गया। 1952 में जब कांग्रेस को 150 सीटें मिलीं, तो मुख्य विपक्ष सीपीआई सिर्फ 28 पर रह गया। वामपंथ के उदय के समय भी यही स्थिति रही। 1987 में लेफ्ट ने 187 सीटें जीतीं, तो कांग्रेस महज 40 पर रह गई। ममता बनर्जी के दौर में भी विपक्ष की हालत पतली रही; 2016 में टीएमसी ने 211 सीटें जीतीं और कांग्रेस 44 पर ही रुक गई। 2021 में भाजपा ने 3 सीटों से लंबी छलांग लगाकर 77 सीटें जीतकर इतिहास तो रचा, लेकिन वह भी 100 का आंकड़ा नहीं छू सकी।

केवल दो बार दिखा ‘त्रिशंकु’ का रोमांच

बंगाल के राजनीतिक इतिहास में केवल 1967 और 1971 ही ऐसे साल थे जब विपक्ष 100 के पार गया, लेकिन वह दौर अस्थिरता और गठबंधन सरकारों का था। 1967 में कांग्रेस को 127 सीटें मिलीं पर वह विपक्ष में बैठने को मजबूर हुई क्योंकि यूनाइटेड फ्रंट ने सरकार बनाई थी। वहीं 1971 में सीपीआई(एम) को 113 और कांग्रेस को 105 सीटें मिलीं, लेकिन किसी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलने के कारण सरकार ज्यादा दिन नहीं चल सकी। इन अपवादों को छोड़ दें, तो बंगाल में विपक्ष हमेशा से 30 से 80 सीटों के बीच ही झूलता रहा है।

92.72% की रिकॉर्ड वोटिंग: बदलाव की आहट या समर्थन की लहर?

2026 के विधानसभा चुनाव के पहले चरण में हुई 92.72% की ऐतिहासिक वोटिंग ने राजनीतिक पंडितों को सिर खुजलाने पर मजबूर कर दिया है। इतनी भारी वोटिंग के दो ही मायने निकाले जाते हैं- या तो सरकार के खिलाफ जबरदस्त गुस्सा (Anti-incumbency) है, या फिर सरकार की योजनाओं के पक्ष में जबरदस्त उत्साह। भाजपा का मानना है कि यदि वह अपना वोट शेयर 42-45% तक ले जाने में सफल रहती है, तो वह 2021 की 50-60 वैसी सीटों को जीत सकती है जहां हार का अंतर बहुत कम था। अगर ऐसा हुआ, तो भाजपा न सिर्फ 100 का आंकड़ा पार करेगी, बल्कि बंगाल के इतिहास में पहली बार ‘भगवा’ सरकार का सपना भी सच हो सकता है।

लक्ष्मी भंडार’ बनाम ‘हिंदुत्व और अस्मिता’ की जंग

इस बार की चुनावी लड़ाई बेहद दिलचस्प हो चुकी है। टीएमसी की ओर से ममता बनर्जी की ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी कल्याणकारी योजनाएं महिलाओं के बीच एक मजबूत सुरक्षा कवच बनी हुई हैं। टीएमसी को भरोसा है कि उनका ‘बाहरी बनाम बंगाली’ वाला नैरेटिव विपक्ष को एक बार फिर दहाई के आंकड़ों में ही रोक देगा। दूसरी ओर, भाजपा ने ‘झालमुड़ी पॉलिटिक्स’ और ‘सब्जी पॉलिटिक्स’ के जरिए आम आदमी से जुड़ने की कोशिश की है। ‘बंगाली अस्मिता बनाम हिंदुत्व’ की इस वैचारिक जंग में 29 अप्रैल को होने वाला दूसरा चरण निर्णायक होगा, जहां 142 सीटों पर जनता अपना फैसला सुनाएगी।

4 मई का इंतजार: क्या बनेगा नया रिकॉर्ड?

अब सबकी नजरें 4 मई 2026 पर टिकी हैं। क्या भाजपा 2021 के अपने 77 सीटों के रिकॉर्ड को तोड़कर ‘सेंचुरी’ मार पाएगी? या फिर ममता बनर्जी अपनी रणनीतियों से विपक्ष को एक बार फिर 100 के नीचे धकेलकर एकतरफा बहुमत का रिकॉर्ड बरकरार रखेंगी? बंगाल में विपक्ष की नई हैसियत क्या होगी, यह इस चुनाव के नतीजे तय करेंगे। यदि इस बार विपक्ष 100 पार कर जाता है, तो यह बंगाल की सात दशक पुरानी राजनीतिक परंपरा का अंत होगा और एक नए ‘द्वि-ध्रुवीय’ राजनीतिक युग की शुरुआत मानी जाएगी।

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