
Dark Mesh: न IP एड्रेस, न कॉल रिकॉर्ड… आखिर कैसे काम करता है यह सीक्रेट नेटवर्क?
Dark Mesh: इसमें न तो कोई आइपी एड्रेस उत्पन्न होता है, न ही कोई कॉल रिकॉर्ड बनता है। जब कोई डेटा टेलीकॉम कंपनियों के सर्वर से गुजरता ही नहीं, तो इसकी ट्रैकिंग करीब नामुमकिन हो जाती है। दिल्ली में CJP के प्रदर्शन के दौरान इसके प्रयोग की बातें सामने आ रही हैं।
अगर किसी इलाके में तनाव के बाद प्रशासन ने एहतियातन इंटरनेट सेवाएं निलंबित कर दी हों, मोबाइल टावर बंद हों, सिम कार्ड का सिग्नल ‘No Service’ दिखा रहा है। फिर भी सड़क पर मौजूद भीड़ को रणनीतिक संदेश (text) धड़ाधड़ मोबाइल पर मिल रहे हों! ये कोई कोरी कल्पना नहीं, बल्कि ‘ऑफ-ग्रिड मेश नेटवर्किंग’ (Off-Grid Mesh Networking) की वो तकनीकी हकीकत है, जिसने सुरक्षा एजेंसियों की नींद उड़ा रखी है।
मोबाइल टावर को बायपास कर ब्लूटूथ का होता है उपयोग
तकनीकी भाषा में इसे Bluetooth Mesh Networking कहा जाता है। आम तौर पर ब्लूटूथ की रेंज महज 10 से 100 मीटर होती है। लेकिन जब Briar, Bridgefy या BitChat जैसी मेश मैसेजिंग ऐप्स कई लोगों के फोन में पहले से डाउनलोड हों और वे लोग किसी खास इलाके में मौजूद हों, तो यह तकनीक एक ‘डिजिटल रिले चेन’ (Digital Chain) बना लेती है। जिसमें सीढ़ी की तरह कोई संदेश (text) ब्लूटूथ के माध्यम से एक के बाद एक व्यक्ति तक पहुंचाया जा सकता है।
कैसे बनती है डिजिटल चेन?
यदि ‘व्यक्ति A’ को 1 किलोमीटर दूर खड़े ‘व्यक्ति Z’ को गोपनीय संदेश भेजना है, तो मैसेज बीच में मौजूद ‘B’, ‘C’, ‘D’, ‘E’ आदि के स्मार्टफोन के ब्लूटूथ इस्तेमाल करते हुए व्यक्ति Z पहुंच जाएगा। बीच में चाहे सभी लोगों के फोन में चाहे एयरप्लेन मोड तक लगा हो, लेकिन सिर्फ ब्लूटूथ चालू होना चाहिए। यानी अगर भीड़ में B, C, D, E आदि इस डिजिटल चेन का ‘हिस्सा’ बनने को सहमत हों तो A से Z तक ‘गोपनीय संदेश’ बिना सुरक्षा एजेंसियों के सर्विलांस में आए तुरंत पहुंच जाएगा।
एंड-टु-एंड एन्क्रिप्टेड, ट्रैकिंग लगभग नामुमकिन
इसमें खास बात ये है कि A ने Z को क्या मैसेज भेजा, ये सिर्फ A और Z ही देख पाएंगे। संदेश एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड (E2EE) होते हैं, जिससे बीच के फोन वाले लोग भी उसे पढ़ नहीं सकते। मैसेज भेजने और प्राप्त करने के दौरान मोबाइल टावर और इंटरनेट सर्वर पूरी तरह बायपास (Bypass) हो जाते हैं। साइबर विशेषज्ञों के मुताबिक, इस नेटवर्क में न तो कोई आइपी एड्रेस (IP Address) उत्पन्न होता है और न ही कोई कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) बनता है। जब कोई डेटा टेलीकॉम कंपनियों के सर्वर से गुजरता ही नहीं, तो सेंट्रल मॉनिटरिंग सिस्टम (CMS) के जरिए इसकी रीयल-टाइम ट्रैकिंग लगभग नामुमकिन हो जाती है।
हांगकांग में जब ‘इंटरनेट शटडाउन’ के बीच घातक बना था ‘मेश नेटवर्क’
वैश्विक स्तर पर विरोध-प्रदर्शनों और नागरिक अशांति के दौरान इस तकनीक का इस्तेमाल एक स्थापित पैटर्न बन चुका है। सबसे पहले हांगकांग के लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शन (2019-20) में मेश नेटवर्किंग का सबसे बड़ा और आधिकारिक रूप से दर्ज उदाहरण सामने आया था। जब पुलिस निगरानी और डिजिटल सेंसरशिप बढ़ी, तो प्रदर्शनकारियों ने ‘Bridgefy’ ऐप का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया था। हांगकांग पुलिस के तत्कालीन साइबर सुरक्षा अधिकारियों ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि ‘ऑफ-लाइन P2P संचार के कारण भीड़ की आवाजाही का पहले से अनुमान लगाना बेहद कठिन हो गया था।’
ईरान के विरोध प्रदर्शन में इस्तेमाल
सितंबर 2022 में ईरान में जब देशव्यापी हिंसक झड़पें भड़कीं, तो सरकार ने इंटरनेट और सेल्युलर नेटवर्क को पूरी तरह ठप कर दिया।
इंटरनेट शटडाउन के बावजूद प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षा बलों की मूवमेंट, आंसू गैस के हमलों के स्थान और एम्बुलेंस के रास्तों की जानकारी साझा करने के लिए ब्लूटूथ मेश मैसेजिंग का सहारा लिया, जिससे पुलिस की निगरानी रणनीति बुरी तरह विफल हो गई थी।
दिल्ली में हालिया छात्र प्रदर्शन
हाल ही में नई दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के ‘संसद चलो’ मार्च और जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान मोबाइल इंटरनेट बंद किए जाने के बावजूद ब्लूटूथ मेश ऐप्स का इस्तेमाल किए जाने की खबर सामने आई हैं। समाचार एजेंसियों तथा दिल्ली पुलिस सूत्रों के अनुसार, जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान इंटरनेट सेवाएं बंद रहने पर प्रदर्शनकारियों द्वारा ‘Bitchat’, ‘Bridgefy’ और ‘Briar’ जैसे ब्लूटूथ आधारित ऑफ-लाइन ऐप्स के उपयोग किए जाने के इनपुट्स मिले हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए दिल्ली पुलिस और स्पेशल सेल ने इसकी जांच शुरू की है।
गृह मंत्रालय जाहिर कर चुका है चिंता
गृह मंत्रालय (MHA) और साइबर सुरक्षा एजेंसियां (CERT-In) इस उभरते तकनीकी खतरे को लेकर ‘अलर्ट मोड’ में हैं। गृह मंत्रालय (I4C) के नोटिस में आधिकारिक रूप से कह चुका है कि ‘Bitchat और इसके जैसे मेश ऐप्स मोबाइल नेटवर्क, इंटरनेट कनेक्टिविटी या केंद्रीय सर्वर पर निर्भर हुए बिना ब्लूटूथ लो एनर्जी (BLE) मेश नेटवर्क पर डिसेंट्रलाइज्ड पीयर-टू-पीयर मैसेजिंग की सुविधा प्रदान करते हैं। ये तकनीकी ढांचा कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा की जाने वाली कानूनी निगरानी और जांच प्रक्रिया में गंभीर बाधा उत्पन्न करता है।’
जानिए क्या कर रही हैं सुरक्षा एजेंसियां
कानून लागू करने वाली एजेंसियां संवेदनशील क्षेत्रों और हाई-प्रोफाइल आयोजनों के मद्देनजर नए परीक्षण कर रही हैं। रेडियो फ्रीक्वेंसी (RF) और सिग्नल जैमिंग में अब ऐसे आधुनिक जैमर्स का परीक्षण किया जा रहा है जो केवल मोबाइल नेटवर्क ही नहीं, बल्कि ‘ब्लूटूथ और वाई-फाई स्पेक्ट्रम’ (GHz बैंड) को भी सीमित दायरे में ब्लॉक कर सकें।
ब्लूटूथ मेश नेटवर्क की सबसे बड़ी कमजोरी
ऐसे मैसेज यानी ब्लूटूथ मेश नेटवर्क की रीढ़ ‘लोगों की मौजूदगी’ है, इसलिए सुरक्षा बल अब भीड़ को तुरंत तितर-बितर (Disperse) करने की रणनीति पर काम करते हैं। यदि दो फोनों के बीच की दूरी 50-100 मीटर से अधिक हो जाए, तो मेश नेटवर्क की चेन की डिजिटल चेन अपने आप टूट जाती है। परिणामस्वरूप, A का संदेश Z तक पहुंचने से पहले ही रुक जाएगा। ऐसे में सटीक खुफिया इनपुट्स और सुरक्षा एजेंसियों की ‘सख्ती’ से ऐसी नेटवर्क चेन को बनने से पहले ही ध्वस्त किया जा सकता है।
