Government School: सरकारी स्कूलों के विस्तार के बाद अब गुणवत्ता की चुनौती

Government School: सरकारी स्कूलों के विस्तार के बाद अब गुणवत्ता की चुनौती

Government School: भारत ने आजादी के बाद से स्कूली शिक्षा के विस्तार में एक लंबा सफर तय किया है। देश की आबादी चार गुना बढ़ी, तो स्कूलों की संख्या भी करीब दस गुना बढ़कर एक मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार करने में सफल रही। लेकिन आज सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि क्या सरकारी स्कूल अपनी गुणवत्ता, पहुंच और प्रासंगिकता को उसी रफ्तार से बनाए रख पाए हैं?

हाल के वर्षों में कई राज्यों में छात्रों और अभिभावकों द्वारा बेहतर सुविधाओं के लिए किए गए प्रदर्शनों ने यह साफ कर दिया है कि देश की प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा व्यवस्था बड़े ढांचागत और नीतिगत संकट से जूझ रही है।

घटता सरकारी दायरा और गिरता नामांकन (यूडीआईएसई+ और नीति आयोग के आंकड़े)

शिक्षा मंत्रालय की ‘यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इंफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन प्लस’ (UDISE+) और नीति आयोग की रिपोर्ट ‘स्कूल सिस्टम्स इन इंडिया’ के आंकड़े एक चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं:

84,000 स्कूलों में ताले: वर्ष 2018-19 से 2025-26 के बीच देश में लगभग 84,000 सरकारी और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूल बंद या विलय (Merge) हो गए हैं। इस दौरान सरकारी स्कूलों की कुल संख्या 11 लाख से घटकर 10 लाख के स्तर पर आ गई है।

1.5 करोड़ छात्रों की गिरावट: सरकारी व सहायता प्राप्त स्कूलों में नामांकित विद्यार्थियों की संख्या 2018-19 के 15.90 करोड़ से घटकर 2025-26 में 14.40 करोड़ रह गई है—यानी करीब 1.5 करोड़ बच्चों का नुकसान।

निजी स्कूलों की ओर पलायन: इसी 7 वर्ष की अवधि में निजी स्कूलों में छात्रों के नामांकन में 70 लाख की शुद्ध वृद्धि दर्ज की गई। हालांकि 3 से 17 वर्ष आयु वर्ग की आबादी में जनसांख्यिकीय बदलाव (प्रजनन दर में कमी) से करीब 2 करोड़ बच्चे घटे हैं, फिर भी सरकारी स्कूलों का तेजी से खाली होना सीधे तौर पर गिरते विश्वास को दर्शाता है।

हिस्सेदारी में गिरावट: देश के कुल स्कूलों में सरकारी और सहायता प्राप्त स्कूलों की हिस्सेदारी एक दशक पहले 80% थी, जो अब घटकर लगभग 75% रह गई है।

 विलय (School Consolidation) की नीतियां और लड़कियों की पढ़ाई पर असर

नीति आयोग का तर्क है कि संसाधनों के अधिकतम उपयोग और दक्षता बढ़ाने के लिए कम छात्रों वाले छोटे स्कूलों का विलय जरूरी था। लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत भी है:

स्कूलों की दूरी बढ़ना: स्कूलों के विलय के कारण ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में बच्चों के लिए स्कूल की दूरी बढ़ गई है।

ड्रॉपआउट में उछाल: दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षा संकाय की पूर्व डीन प्रो. अनीता रामपाल के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में माता-पिता सुरक्षा कारणों से बेटियों को 2-3 किलोमीटर दूर अकेले भेजने में असहज महसूस करते हैं। नतीजतन, प्राथमिक से माध्यमिक स्तर पर पहुंचते-पहुंचते लड़कियों की ड्रॉपआउट दर तेजी से बढ़ जाती है।

समाधान की मिसाल: पूर्व स्कूल शिक्षा सचिव अनिल स्वरूप का मानना है कि यदि विलय अपरिहार्य हो, तो छात्रों के लिए सुरक्षित और रियायती परिवहन सुनिश्चित होना चाहिए। बिहार में ‘मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना’ तथा तमिलनाडु, केरल व कर्नाटक में रियायती बस पास की व्यवस्था ने छात्रों के स्कूल में बने रहने की दर (Retention Rate) में उल्लेखनीय सुधार दिखाया है।

राज्यों का शिक्षा बजट: यूनेस्को मानकों से काफी पीछे (आरबीआई रिपोर्ट)

भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के ‘स्टेट फाइनेंसेज’ आंकड़ों के अनुसार, अधिकांश भारतीय राज्य शिक्षा पर अपने कुल बजट का औसतन 13% से 14% ही खर्च कर रहे हैं, जबकि यूनेस्को (UNESCO) का वैश्विक मानक 15% से 20% का है।

खर्च में अग्रणी राज्य (15% से अधिक):

बिहार: 18.7% (2018-19 के बाद स्कूलों में 5.2% की वृद्धि)

उत्तराखंड: 17.4%

राजस्थान: 16.9% (स्कूलों में 3.5% की वृद्धि)

छत्तीसगढ़: 16.2%

महाराष्ट्र: 15.4%

खर्च की दिशा में असंतुलन: बजट का बड़ा हिस्सा केवल वेतन और प्रशासनिक व्यय में चला जाता है, जबकि आधुनिक लैब, पुस्तकालय, स्मार्ट क्लास और शिक्षक प्रशिक्षण के लिए पूंजीगत खर्च सीमित रह जाता है।

लर्निंग आउटकम और बुनियादी ढांचे का संकट (ASER रिपोर्ट)

सार्वजनिक शिक्षा पर सबसे ज्यादा निर्भरता ग्रामीण भारत की है, जहाँ 66% बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं (शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा मात्र 30% है)। इसके बावजूद ग्रामीण स्कूलों में गुणवत्ता बेहद लाचार है:

बुनियादी पठन और गणितीय कौशल का अभाव: एनजीओ ‘प्रथम’ की वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट (ASER) के अनुसार, ग्रामीण सरकारी स्कूलों में कक्षा 3 के लगभग 75% छात्र कक्षा 2 स्तर की आसान किताब नहीं पढ़ पाते। कक्षा 3 और 5 के बहुतायत छात्र बुनियादी घटाव और भाग के सवाल हल करने में असमर्थ हैं।

शौचालय व पानी की कमी: आंकड़ों के अनुसार 94.2% स्कूलों में चालू हालत में शौचालय हैं, जिसका अर्थ है कि आज भी देश के लगभग 63,000 सरकारी स्कूलों में सुरक्षित शौचालय की सुविधा नहीं है।

एकल-शिक्षक स्कूल (Single-Teacher Schools): देश में वर्तमान में करीब 1,04,125 स्कूल केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं, जहाँ 33 लाख से अधिक मासूमों का भविष्य दांव पर है।

अप्रशिक्षित शिक्षक: देश के कुल एक करोड़ से अधिक शिक्षकों में से 50.9% सरकारी स्कूलों में हैं, लेकिन इनमें से लगभग 10 लाख शिक्षक अभी भी आधुनिक शिक्षण पद्धतियों में पर्याप्त रूप से कुशल या प्रशिक्षित नहीं हैं।

रेवड़ी संस्कृति बनाम शिक्षा में दीर्घकालिक पूंजीगत निवेश

पिछले कुछ वर्षों में राज्यों की वित्तीय प्राथमिकताओं में खतरनाक बदलाव देखा गया है:

कैश ट्रांसफर (डीबीटी) में भारी उछाल: राज्यों के बजट में प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण (Cash Transfers/Freebies) की हिस्सेदारी 2018-19 के मात्र 3% से बढ़कर 2025-26 में 20% पर पहुंच गई है।

सामाजिक क्षेत्र के निवेश में कटौती: वहीं दूसरी ओर शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी आवास पर प्रत्यक्ष सब्सिडी व विकास खर्च 13% से घटकर 11% रह गया है।

पूर्व शिक्षा सचिव अनिल स्वरूप के अनुसार, राजनीतिक दल 5 साल के चुनावी चक्र में तात्कालिक नकद लाभ बांटना ज्यादा पसंद करते हैं, जबकि शिक्षा में निवेश का परिणाम 15-20 साल बाद दिखता है।

निजी स्कूलों की कार्यसंस्कृति और केंद्रीय मॉडलों से क्या सीखें?

केंद्रीय विद्यालय (KVS) और नवोदय विद्यालय (NVS) साबित करते हैं कि यदि सरकारी इच्छाशक्ति, जवाबदेही और पर्याप्त संसाधन हों, तो सरकारी तंत्र निजी क्षेत्र से बेहतर प्रदर्शन कर सकता है। सरकारी स्कूलों को निजी क्षेत्र से निम्नलिखित कार्यसंस्कृति अपनाने की आवश्यकता है:

गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्ति: सरकारी शिक्षकों को जनगणना, चुनाव और प्रशासनिक ड्यूटियों से मुक्त कर शत-प्रतिशत समय अध्यापन के लिए सुरक्षित किया जाए।

नियमित शिक्षक-अभिभावक संवाद (PTM): छात्रों के परीक्षा परिणामों की नियमित समीक्षा में अभिभावकों को सक्रिय रूप से शामिल किया जाए।

सख्त जवाबदेही और सामाजिक ऑडिट: ग्राम शिक्षा समितियों और सामाजिक संगठनों को स्कूल प्रबंधन और शिक्षकों की उपस्थिति की निगरानी का वास्तविक अधिकार मिले।

सुधार के तीन अनिवार्य सूत्र

1. सजगता और स्थानीय जनभागीदारी: दक्षिण भारत के राज्यों की तर्ज पर स्थानीय समुदाय और अभिभावक स्कूल के संचालन, मध्याह्न भोजन की गुणवत्ता और शिक्षक उपस्थिति का नियमित सोशल ऑडिट करें।

2. संसाधनों की युद्धस्तर पर बहाली: एकल-शिक्षक स्कूलों की व्यवस्था को समाप्त कर हर कक्षा के लिए विषय-विशेष शिक्षक और 100% स्कूलों में इंटरनेट, कंप्यूटर व स्वच्छ शौचालय उपलब्ध कराए जाएं।

3. प्रशिक्षण और पारदर्शी कैडर प्रबंधन: शिक्षकों को प्रशासनिक कार्यों से अलग कर आधुनिक शैक्षणिक तकनीकों और एआई टूल्स का प्रशिक्षण दिया जाए, ताकि सरकारी स्कूल केवल गरीबों का विकल्प न रहकर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का राष्ट्रीय केंद्र बनें।

 

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