Ken-Betwa Link Project: ‘हार्ट ऑफ इंडिया’ की सबसे स्वच्छ नदियों में शामिल केन पर क्यों हो रहा विरोध? समझें पूरा मामला

Ken-Betwa Link Project: ‘हार्ट ऑफ इंडिया’ की सबसे स्वच्छ नदियों में शामिल केन पर क्यों हो रहा विरोध? समझें पूरा मामला

Ken-Betwa Link Project:  मध्य प्रदेश को भारत का ‘हार्ट ऑफ इंडिया’ कहा जाता है। यहां के घने जंगल, पहाड़ियां, नदियां और वन्यजीव इसकी प्राकृतिक पहचान हैं। इन्हीं में केन नदी सबसे खूबसूरत और स्वच्छ नदियों में गिनी जाती है। लगभग 427 किलोमीटर लंबी यह नदी मध्य प्रदेश के कटनी जिले के पास से निकलती है और पन्ना, छतरपुर होते हुए उत्तर प्रदेश में यमुना नदी में मिल जाती है।

केन नदी सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, बल्कि बुंदेलखंड के लाखों लोगों की जीवनरेखा है। इसके किनारे बसे गांवों की खेती, पशुपालन और दैनिक जीवन इसी नदी पर निर्भर है। नदी से सिंचाई होती है, पीने का पानी मिलता है और आसपास के जंगलों की जैव विविधता भी इसी पर टिकी है।

केन नदी पन्ना टाइगर रिजर्व से होकर गुजरती है, जहां बाघ, तेंदुआ, घड़ियाल, गिद्ध, भालू, चिंकारा और सैकड़ों पक्षियों की प्रजातियां पाई जाती हैं। विश्व प्रसिद्ध रानेह फॉल्स (Raneh Falls) और केन घड़ियाल अभयारण्य भी इसी नदी की पहचान हैं। नदी के किनारे बनी गहरी ग्रेनाइट घाटियां और झरने मध्य प्रदेश की प्राकृतिक सुंदरता को और खास बनाते हैं।

आदिवासी समुदायों के लिए केन नदी केवल एक जलधारा नहीं, बल्कि उनकी संस्कृति, आस्था और परंपराओं का हिस्सा है। यहां रहने वाले कई परिवारों की आजीविका खेती के साथ-साथ जंगल से मिलने वाले महुआ, तेंदूपत्ता, शहद, जड़ी-बूटियों और मछली पकड़ने पर आधारित है। उनके धार्मिक स्थल, श्मशान घाट और पूर्वजों से जुड़ी कई स्मृतियां भी इसी नदी और जंगलों के आसपास स्थित हैं।

इसी मध्य प्रदेश में आजकल एक विरोध की आवाज समय के साथ पुरजोर होती जा रही है। खासतौर से इस राज्य के पन्ना और छतरपुर जिलों से सामने आई कुछ तस्वीरों ने पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। कहीं आदिवासी महिलाएं लकड़ियों से बनी प्रतीकात्मक चिता पर लेटी हुई हैं, तो कहीं ग्रामीण घंटों तक नदी के पानी में खड़े होकर जल सत्याग्रह कर रहे हैं। उनके हाथों में तख्तियां हैं और एक ही मांग गूंज रही है।

….’न्याय दो या मौत दो।’ यह विरोध किसी छोटी स्थानीय समस्या को लेकर नहीं, बल्कि देश की पहली राष्ट्रीय नदी जोड़ो परियोजना केन-बेतवा लिंक परियोजना के खिलाफ है। सरकार इसे बुंदेलखंड की तस्वीर बदलने वाली योजना बता रही है। जबकि प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि यह परियोजना उनके घर, जंगल, खेत, संस्कृति और अस्तित्व को खत्म कर देगी। आखिर इस परियोजना में ऐसा क्या है कि विरोध का तरीका चिता आंदोलन तक पहुंच गया? आइए विस्तार से समझते हैं-

क्या है केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना?

केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना भारत की पहली राष्ट्रीय नदी जोड़ो योजना है। इसका उद्देश्य मध्य प्रदेश की केन नदी के अतिरिक्त पानी को बेतवा नदी तक पहुंचाना है, ताकि बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की कमी दूर की जा सके। इस परियोजना के पहले चरण में पन्ना टाइगर रिजर्व के पास केन नदी पर दौधन बांध बनाया जा रहा है। इसके साथ लगभग 221 किलोमीटर लंबी नहर, सुरंगें, पंपिंग स्टेशन और अन्य जल संरचनाएं तैयार की जाएंगी। यह परियोजना मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश दोनों राज्यों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सरकार का कहना है कि इससे बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाकों को स्थायी जल स्रोत मिलेगा और लंबे समय से चली आ रही पानी की समस्या काफी हद तक समाप्त हो सकती है।

सरकार के लिए क्यों हैं बेहद महत्वपूर्ण यह परियोजना

बुंदेलखंड वर्षों से सूखा, जल संकट और खेती की समस्याओं से जूझता रहा है। यही वजह है कि केंद्र और दोनों राज्य सरकारें इस परियोजना को क्षेत्र के विकास की आधारशिला मान रही हैं।

सरकारी दावों के अनुसार, इस परियोजना से लगभग 10.62 लाख हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई सुविधा मिलेगी। करीब 62 लाख लोगों तक पेयजल पहुंचाया जाएगा। साथ ही जलविद्युत उत्पादन भी होगा। जिससे बिजली आपूर्ति मजबूत होगी। सरकार का मानना है कि इससे किसानों की आय बढ़ेगी, फसल उत्पादन बेहतर होगा और क्षेत्र का आर्थिक विकास तेज होगा।

विरोध की सबसे बड़ी वजह क्या है?

परियोजना के लाभों के साथ यहां के निवासियों के सामने एक बड़ा सवाल भी जुड़ा है विस्थापन का।

दौधन बांध बनने के कारण पन्ना और छतरपुर जिले के कई गांव पूरी तरह या आंशिक रूप से डूब क्षेत्र में आ जाएंगे। प्रभावित परिवारों में बड़ी संख्या आदिवासी समुदाय की है। जो पीढ़ियों से इन जंगलों और गांवों में रह रहे हैं।

ग्रामीणों का कहना है कि उनके लिए सिर्फ मकान या खेत नहीं, बल्कि पूरा जीवन दांव पर लगा है। गांव छोड़ने का मतलब होगा अपने पुश्तैनी घर, खेती की जमीन, जंगल, नदी, चरागाह, देवस्थल, श्मशान और पूर्वजों से जुड़ी सांस्कृतिक पहचान को हमेशा के लिए पीछे छोड़ देना।

आंदोलन में शामिल लोग बार-बार यह बात दोहरा रहे हैं कि उनकी जिंदगी जंगल और जमीन से जुड़ी हुई है। उनकी आय का बड़ा हिस्सा खेती, पशुपालन और जंगल से मिलने वाले महुआ, तेंदूपत्ता, लकड़ी तथा औषधीय पौधों पर निर्भर करता है। विशेषज्ञ भी मानते हैं कि आदिवासी समुदाय के लिए विस्थापन केवल स्थान परिवर्तन नहीं होता, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक जीवन का बड़ा बदलाव होता है। कई बार पुनर्वास के बाद भी लोगों को पहले जैसी आजीविका और सामाजिक व्यवस्था नहीं मिल पाती।

‘चिता आंदोलन’ क्यों बना चर्चा का विषय?

इस आंदोलन की सबसे अलग तस्वीर तब सामने आई, जब आदिवासी महिलाएं नदी किनारे लकड़ियों से बनी प्रतीकात्मक चिता पर लेट गईं। उनका कहना था कि यदि उनकी जमीन और गांव छिन गए तो उनके लिए यह जिंदा रहते हुए मौत के समान होगा। इसलिए उन्होंने “न्याय दो या मौत दो” का संदेश देने के लिए चिता आंदोलन शुरू किया। यह विरोध सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ और पूरे देश में चर्चा का विषय बन गया। महिलाओं का कहना है कि उनका उद्देश्य हिंसा नहीं, बल्कि अपनी पीड़ा को देश तक पहुंचाना है।

जल सत्याग्रह क्यों कर रहे हैं ग्रामीण?

चिता आंदोलन के साथ-साथ कई ग्रामीण घंटों तक नदी के पानी में खड़े होकर जल सत्याग्रह भी कर रहे हैं। भारत में जल सत्याग्रह अहिंसक विरोध का एक प्रतीक माना जाता है। इसमें प्रदर्शनकारी पानी में खड़े रहकर अपनी मांगों के समर्थन में शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराते हैं। प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि वे तब तक आंदोलन जारी रखेंगे, जब तक उनकी मांगों पर स्पष्ट निर्णय नहीं लिया जाता।

आंदोलन कब से चल रहा है?

प्रभावित ग्रामीण कई वर्षों से अपनी चिंताएं प्रशासन और सरकार के सामने रखते रहे हैं। हालांकि अप्रैल 2026 में आंदोलन ने बड़ा रूप ले लिया। पहले धरना शुरू हुआ, फिर जल सत्याग्रह हुआ और बाद में चिता आंदोलन ने राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया। प्रशासन के आश्वासन के बाद कुछ समय के लिए आंदोलन स्थगित हुआ, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद जुलाई 2026 में आंदोलन दोबारा शुरू हो गया और अब लगातार जारी है।

आंदोलनकारियों की मुख्य मांगें क्या हैं?

ग्रामीणों की मांग है कि प्रभावित परिवारों का नए सिरे से निष्पक्ष सर्वे कराया जाए। बाजार मूल्य के अनुरूप उचित मुआवजा दिया जाए। पुनर्वास स्थल पर पहले घर, खेती योग्य जमीन, सड़क, बिजली, पानी, स्कूल और स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। इसके अलावा वे चाहते हैं कि वन अधिकार कानून के तहत आदिवासी समुदाय के अधिकारों की पूरी तरह रक्षा की जाए और किसी भी परिवार को पुनर्वास पूरा होने से पहले गांव छोड़ने के लिए मजबूर न किया जाए।

सरकार और प्रशासन का क्या कहना है?

सरकार का कहना है कि केन-बेतवा परियोजना बुंदेलखंड के भविष्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण है और इससे लाखों लोगों को लाभ मिलेगा।
प्रशासन का दावा है कि प्रभावित परिवारों को मुआवजा और पुनर्वास पैकेज दिया जा रहा है। जिन लोगों को सर्वे या मुआवजे को लेकर शिकायत है, उनकी जांच कराई जा रही है। आवश्यकता पड़ने पर दोबारा सर्वे की भी बात कही गई है। सरकार का यह भी कहना है कि विकास परियोजनाओं के साथ प्रभावित लोगों के हितों की रक्षा करना उसकी प्राथमिकता है।

पर्यावरण से जुड़े सवाल भी उठ रहे हैं

केन-बेतवा परियोजना को लेकर पर्यावरण विशेषज्ञों ने भी समय-समय पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि बांध बनने से जंगल का कुछ हिस्सा प्रभावित होगा और वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास पर असर पड़ सकता है। खासतौर पर पन्ना टाइगर रिजर्व के आसपास होने वाले निर्माण कार्यों को लेकर कई पर्यावरणीय सवाल पहले भी उठते रहे हैं। परियोजना को आवश्यक पर्यावरणीय और वन संबंधी मंजूरियां मिल चुकी हैं। सरकार का कहना है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए निर्धारित शर्तों का पालन किया जा रहा है।

डॉ. रघु चुंडावत (वन्यजीव संरक्षण विशेषज्ञ)

पन्ना टाइगर रिजर्व पर लंबे समय तक शोध कर चुके वन्यजीव संरक्षण विशेषज्ञ डॉ. रघु चुंडावत का कहना है कि बड़े विकास कार्यों में स्थानीय समुदायों और पर्यावरणीय कानूनों की अनदेखी नहीं होनी चाहिए। उनके अनुसार, पन्ना के जंगल और यहां रहने वाले आदिवासी समुदाय का रिश्ता केवल जमीन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उनकी आजीविका और सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा है।

हिमांशु ठक्कर (दक्षिण एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स एंड पीपल – SANDRP)

दी विशेषज्ञ हिमांशु ठक्कर लंबे समय से केन-बेतवा परियोजना का अध्ययन कर रहे हैं। उनका कहना है कि किसी भी नदी जोड़ो परियोजना से पहले यह वैज्ञानिक रूप से सुनिश्चित होना चाहिए कि संबंधित नदी में वास्तव में “अधिशेष (Surplus) जल” उपलब्ध है। उनका मानना है कि परियोजना के पर्यावरणीय और सामाजिक प्रभावों का निष्पक्ष आकलन आवश्यक है।

राजेंद्र सिंह (‘वॉटरमैन ऑफ इंडिया’)

जल संरक्षण विशेषज्ञ राजेंद्र सिंह का कहना है कि विकास परियोजनाओं में सबसे अधिक असर गरीब और आदिवासी समुदायों पर पड़ता है। उनके अनुसार, बड़े बांधों की बजाय स्थानीय जल संरक्षण, तालाबों के पुनर्जीवन और वर्षा जल संचयन जैसे उपाय बुंदेलखंड की जल समस्या का अधिक टिकाऊ समाधान हो सकते हैं।

विस्थापन पर शोध क्या कहते हैं?

पन्ना टाइगर रिजर्व क्षेत्र में विस्थापन पर शोध करने वाली शोधकर्ता बिक्किना नलिनी (Bikkina Nalini) और उनकी टीम के अध्ययन में पाया गया कि आदिवासी महिलाओं और परिवारों के लिए जंगल, नदी और सामुदायिक संसाधन केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक जीवन का आधार हैं। अध्ययन के अनुसार, केवल आर्थिक मुआवजा इन नुकसानों की पूरी भरपाई नहीं कर सकता।

विकास बनाम विस्थापन की सबसे बड़ी बहस

केन-बेतवा परियोजना केवल एक बांध या नदी जोड़ने की योजना नहीं रह गई है। यह अब विकास और विस्थापन के बीच संतुलन की सबसे बड़ी बहस बन चुकी है।

एक ओर बुंदेलखंड के लाखों लोगों के लिए पानी, सिंचाई और विकास की उम्मीद है, तो दूसरी ओर हजारों आदिवासी परिवार अपने जल, जंगल, जमीन और सांस्कृतिक पहचान को बचाने की लड़ाई लड़ रहे हैं।

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