Ebola Virus Explained: इबोला वायरस ने फिर बढ़ाई दुनिया की चिंता, WHO ने घोषित की हेल्थ इमरजेंसी

Ebola Virus Explained: इबोला वायरस ने फिर बढ़ाई दुनिया की चिंता, WHO ने घोषित की हेल्थ इमरजेंसी

Ebola Virus Explained: इबोला वायरस ने एक बार फिर दुनिया की चिंता बढ़ानी शुरू कर दी है। अफ्रीका के कई देशों, खासकर कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और युगांडा में इसके मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य आपात स्थिति घोषित कर दिया है। इसमें सबसे बड़ी चिंता की बात यह है कि इस बार फैला यह वायरस ऐसा स्ट्रेन है, जिसकी कोई तय वैक्सीन या खास दवा अभी उपलब्ध नहीं है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार अब तक इबोला वायरस के अलग-अलग प्रकोपों में हजारों लोग संक्रमित हो चुके हैं। साल 2014-16 में पश्चिम अफ्रीका में फैले सबसे बड़े इबोला प्रकोप में करीब 28 हजार से ज्यादा मामले सामने आए थे, जबकि 11 हजार से अधिक लोगों की मौत हुई थी। डब्ल्यूएचओ के मुताबिक कई प्रकोपों में इबोला की मृत्यु दर 50 प्रतिशत से लेकर 90 प्रतिशत तक दर्ज की गई है।

वहीं डब्ल्यूएचओ के ताजा आंकड़ों के अनुसार अप्रैल 2026 के आखिर से 21 मई 2026 तक कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और युगांडा में इबोला के 746 से ज्यादा संदिग्ध मामले सामने आ चुके हैं, जबकि 176 लोगों की मौत हो चुकी है। वहीं 85 मामलों की आधिकारिक पुष्टि भी हुई है, जिनमें 10 लोगों की जान गई है। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि संक्रमण तेजी से फैल रहा है और वास्तविक आंकड़े इससे भी ज्यादा हो सकते हैं। वहीं अफ्रीका में अस्पतालों पर दबाव बढ़ रहा है और कई इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था भी कमजोर पड़ती दिख रही है। इसी खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने भी अलर्ट जारी कर दिया है। सरकार ने लोगों को कुछ अफ्रीकी देशों की गैर जरूरी यात्रा से बचने की सलाह दी है और एयरपोर्ट्स पर निगरानी बढ़ा दी गई है। फिलहाल भारत में इबोला का कोई मामला नहीं मिला है, लेकिन स्वास्थ्य एजेंसियां पूरी सतर्कता बरत रही हैं।

क्या है इबोला?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इबोला एक बेहद खतरनाक वायरल बीमारी है, जो इंसानों और कुछ जंगली जानवरों में फैल सकती है। यह बीमारी शरीर में तेजी से संक्रमण फैलाती है और कई मामलों में जानलेवा साबित होती है। इबोला वायरस सबसे पहले अफ्रीका में पाया गया था और इसका नाम वहां बहने वाली एबोला नदी के नाम पर रखा गया। यह वायरस संक्रमित व्यक्ति के खून, पसीने, लार, उल्टी या शरीर के दूसरे तरल पदार्थों के संपर्क में आने से फैलता है। शुरुआत में इसके लक्षण सामान्य बुखार जैसे लगते हैं, लेकिन धीरे-धीरे मरीज की हालत गंभीर हो सकती है। तेज बुखार, कमजोरी, उल्टी-दस्त और कई मामलों में शरीर के अंदर या बाहर खून बहना इसके प्रमुख लक्षण माने जाते हैं। यही वजह है कि दुनिया की स्वास्थ्य एजेंसियां इबोला को सबसे खतरनाक वायरसों में गिनती हैं।

2014-16 में एबोला का कहर और आज की स्थिति

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इबोला का सबसे खतरनाक प्रकोप साल 2014 से 2016 के बीच पश्चिम अफ्रीका में देखने को मिला था। उस समय गिनी, लाइबेरिया और सिएरा लियोन सबसे ज्यादा प्रभावित हुए थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक उस प्रकोप में 28 हजार से ज्यादा लोग संक्रमित हुए थे, जबकि 11 हजार से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। कई देशों में अस्पताल भर गए थे, डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी भी संक्रमण का शिकार हो रहे थे और लोगों में भारी डर का माहौल था। उस समय इबोला केवल अफ्रीका तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अमेरिका और यूरोप तक भी इसके कुछ मामले पहुंचे थे, जिसके बाद पूरी दुनिया अलर्ट पर आ गई थी।

जिसके बाद अब 2026 में एक बार फिर इबोला ने चिंता बढ़ा दी है। इस बार कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और युगांडा में संक्रमण तेजी से फैल रहा है। अप्रैल 2026 के आखिर से शुरू हुए इस प्रकोप में अबतक 746 से ज्यादा संदिग्ध मामले और 176 मौतें दर्ज की जा चुकी हैं। विशेषज्ञों की चिंता इसलिए भी बढ़ी हुई है क्योंकि इस बार फैला बंडीबुग्यो स्ट्रेन ऐसा प्रकार माना जा रहा है, जिसकी कोई तय वैक्सीन अभी उपलब्ध नहीं है। हालांकि वर्तमान प्रकोप 2014-16 जितना बड़ा नहीं हुआ है, लेकिन संक्रमण की रफ्तार और मौतों के बढ़ते आंकड़े दुनियाभर की स्वास्थ्य एजेंसियों को सतर्क कर रहे हैं।

क्या भारत में भी है इबोला का खतरा?

WHO के मुताबिक, फिलहाल भारत में इबोला का एक भी मामला सामने नहीं आया है, लेकिन दुनियाभर में बढ़ते संक्रमण को देखते हुए सरकार पूरी तरह अलर्ट मोड में है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने एयरपोर्ट्स और अंतरराष्ट्रीय एंट्री प्वाइंट्स पर निगरानी बढ़ा दी है, खासकर उन यात्रियों पर नजर रखी जा रही है जो अफ्रीकी देशों से भारत आ रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि इबोला कोरोना की तरह हवा में तेजी से फैलने वाला वायरस नहीं है, इसलिए भारत में बड़े स्तर पर संक्रमण फैलने की आशंका फिलहाल कम मानी जा रही है। हालांकि अगर संक्रमित व्यक्ति समय पर पकड़ में न आए या बिना सावधानी के संपर्क बढ़े, तो खतरा बढ़ सकता है। यही वजह है कि सरकार और स्वास्थ्य एजेंसियां पहले से सतर्कता बरत रही हैं।

इन लक्षणों को न करें नजर अंदाज 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, इबोला के लक्षण शुरुआत में बिल्कुल सामान्य वायरल बुखार जैसे लग सकते हैं, इसलिए कई बार लोग इसे जल्दी पहचान नहीं पाते। आमतौर पर वायरस शरीर में पहुंचने के 2 से 21 दिनों के भीतर इसके लक्षण दिखाई देने लगते हैं। शुरुआत तेज बुखार, सिरदर्द और शरीर टूटने से होती है। मरीज को ऐसा महसूस होता है जैसे अचानक बहुत ज्यादा कमजोरी आ गई हो। कई लोगों को गले में दर्द और ठंड लगने की शिकायत भी होती है।

ध्यान देने वाली बात: दरअसल ये बीमारी धीरे-धीरे गंभीर रूप लेने लगती है। मरीज को उल्टी, दस्त और पेट दर्द शुरू हो सकता है। कुछ लोगों की भूख पूरी तरह खत्म हो जाती है और शरीर में पानी की कमी होने लगती है। हालत बिगड़ने पर त्वचा पर लाल चकत्ते दिख सकते हैं और आंखें लाल होने लगती हैं। सबसे खतरनाक स्थिति तब मानी जाती है जब शरीर के अंदर या बाहर खून बहने लगे। जैसे मसूड़ों से खून आना, उल्टी या मल में खून दिखना, या नाक से खून निकलना। हालांकि हर मरीज में खून बहने वाले लक्षण दिखें, ऐसा जरूरी नहीं है।

इबोला में मरीज की हालत बहुत तेजी से खराब हो सकती है। कई बार शरीर के जरूरी अंग जैसे किडनी और लीवर भी प्रभावित होने लगते हैं। इसलिए डॉक्टर कहते हैं कि अगर किसी व्यक्ति को तेज बुखार के साथ लगातार कमजोरी, उल्टी-दस्त और संक्रमित व्यक्ति के संपर्क का इतिहास हो, तो तुरंत जांच और इलाज जरूरी है।

दरअसल इबोला वायरस हवा में फैलने वाली बीमारी नहीं है, लेकिन यह संक्रमित व्यक्ति के सीधे संपर्क में आने से तेजी से फैल सकता है। इसका सबसे ज्यादा खतरा तब होता है जब कोई व्यक्ति मरीज के खून, पसीने, लार, उल्टी, पेशाब (यूरीन) या शरीर के दूसरे तरल पदार्थों के संपर्क में आता है। अगर ये संक्रमित तरल किसी दूसरे व्यक्ति के कटे हुए हिस्से, आंख, नाक या मुंह के जरिए शरीर में पहुंच जाएं, तो संक्रमण फैल सकता है।

WHO के मुताबिक, इबोला केवल मरीज को छूने से ही नहीं, बल्कि उसकी इस्तेमाल की हुई चीजों से भी फैल सकता है। जैसे संक्रमित कपड़े, बिस्तर, तौलिया, इंजेक्शन या मेडिकल उपकरण अगर ठीक से साफ न किए जाएं तो वायरस दूसरे लोगों तक पहुंच सकता है। यही वजह है कि इबोला के मरीजों का इलाज करते समय डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी खास सुरक्षा किट पहनते हैं।

वहीं यह वायरस कुछ जंगली जानवरों से भी इंसानों में फैल सकता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि चमगादड़ एबोला वायरस के मुख्य स्रोत हो सकते हैं। संक्रमित बंदर, चिंपैंजी या दूसरे जंगली जानवरों के संपर्क में आने या उनका मांस खाने से भी संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।

एक अहम बात यह भी है कि इबोला कोरोना की तरह हवा में लंबे समय तक नहीं फैलता। यानी किसी मरीज के पास से गुजरने भर से आमतौर पर संक्रमण नहीं होता। लेकिन अगर संक्रमित व्यक्ति की देखभाल बिना सावधानी के की जाए, तो यह बीमारी तेजी से कई लोगों तक पहुंच सकती है। इसी कारण जिन इलाकों में इबोला फैलता है, वहां स्वास्थ्य एजेंसियां लोगों को दूरी, सफाई और सुरक्षा नियमों का सख्ती से पालन करने की सलाह देती हैं।

कितना खतरनाक है ये वायरस?

आपकों बताते चलें कि, इबोला वायरस को दुनिया के सबसे खतरनाक वायरसों में गिना जाता है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह शरीर के अंदर बहुत तेजी से असर करता है और कई मामलों में मरीज की जान भी जा सकती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक इबोला से संक्रमित लोगों में मृत्यु दर कई बार 50 प्रतिशत से भी ज्यादा देखी गई है। कुछ पुराने प्रकोपों में यह आंकड़ा 80 से 90 प्रतिशत तक पहुंच चुका है। यही कारण है कि इबोला का नाम सुनते ही दुनियाभर की स्वास्थ्य एजेंसियां अलर्ट हो जाती हैं।

यह वायरस शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्यून सिस्टम पर हमला करता है। धीरे-धीरे यह खून की नसों, लीवर, किडनी और शरीर के दूसरे जरूरी अंगों को नुकसान पहुंचाने लगता है। कई मरीजों में शरीर के अंदर और बाहर खून बहने जैसी गंभीर स्थिति भी बन जाती है। बीमारी बढ़ने पर मरीज को सांस लेने में दिक्कत, अत्यधिक कमजोरी और अंगों के काम करना बंद होने जैसी समस्याएं हो सकती हैं।

इबोला को खतरनाक इसलिए भी माना जाता है क्योंकि शुरुआत में इसके लक्षण सामान्य बुखार जैसे लगते हैं। कई लोग समय पर पहचान नहीं पाते और तब तक संक्रमण दूसरे लोगों तक फैलने लगता है। जिन देशों में स्वास्थ्य सुविधाएं कमजोर होती हैं, वहां यह बीमारी तेजी से बड़ी आपदा बन सकती है।

हालांकि अब इबोला से बचाव के लिए कुछ वैक्सीन और इलाज मौजूद हैं, लेकिन फिर भी इसका खतरा पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अगर समय पर इलाज, आइसोलेशन और सावधानी न बरती जाए, तो यह वायरस कम समय में कई लोगों को संक्रमित कर सकता है। इसलिए डॉक्टर और स्वास्थ्य एजेंसियां इसे बेहद गंभीर और जानलेवा बीमारी मानती हैं।

क्या मौजूद है एबोला का इलाज और वैक्सीन?

अब इबोला को लेकर सबसे बड़ी चिंता यही रहती है कि यह बहुत तेजी से मरीज की हालत खराब कर सकता है। हालांकि अब एबोला के कुछ प्रकारों के लिए वैक्सीन और दवाएं विकसित की जा चुकी हैं। उदाहरण के तौर पर ज़ैरे एबोला वायरस स्ट्रेन के खिलाफ “rVSV-ZEBOV” नाम की वैक्सीन इस्तेमाल की जाती है, जिसे कई देशों में प्रभावी माना गया है। लेकिन इस समय कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य और युगांडा में फैला बंडीबुग्यो स्ट्रेन अलग प्रकार का एबोला वायरस है, जिसके लिए फिलहाल कोई तय और पूरी तरह स्वीकृत वैक्सीन उपलब्ध नहीं मानी जाती। यही वजह है कि स्वास्थ्य एजेंसियों की चिंता और बढ़ गई है।

डॉक्टरों के मुताबिक इबोला का सबसे बड़ा इलाज समय पर पहचान और तुरंत इलाज शुरू करना है। मरीज को आइसोलेशन में रखकर शरीर में पानी की कमी, कमजोरी और दूसरे संक्रमणों को कंट्रोल करने की कोशिश की जाती है। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर शुरुआती चरण में मरीज का इलाज शुरू हो जाए, तो उसकी जान बचने की संभावना काफी बढ़ जाती है। यही वजह है कि स्वास्थ्य एजेंसियां लगातार जांच, निगरानी और जल्दी इलाज पर जोर दे रही हैं।

कैसे करें बचाव?

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक इबोला से बचाव के लिए सबसे जरूरी है संक्रमित व्यक्ति के सीधे संपर्क से बचना। किसी मरीज के खून, पसीने, लार, उल्टी या शरीर के दूसरे तरल पदार्थों के संपर्क में आने से संक्रमण फैल सकता है, इसलिए सावधानी बेहद जरूरी मानी जाती है। डॉक्टर लोगों को बार-बार हाथ साफ रखने, भीड़भाड़ वाली जगहों में सतर्क रहने और संक्रमित व्यक्ति की इस्तेमाल की चीजों को बिना सुरक्षा छूने से बचने की सलाह देते हैं।

अगर कोई व्यक्ति इबोला प्रभावित देशों की यात्रा करके लौटा हो और उसे तेज बुखार, कमजोरी या उल्टी-दस्त जैसे लक्षण दिखाई दें, तो तुरंत जांच करानी चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि मरीज को समय रहते अलग रखना यानी आइसोलेट करना संक्रमण रोकने का सबसे प्रभावी तरीका माना जाता है। यही वजह है कि दुनियाभर की स्वास्थ्य एजेंसियां निगरानी, सफाई और सावधानी को एबोला से बचाव का सबसे बड़ा हथियार बता रही हैं।

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