
TMC New Symbol 2026: ‘जोड़ा फूल’ पर रोक, ममता गुट को मिला नया नाम और चुनाव चिन्ह
TMC new symbol 2026: पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस के बंटवारे के साथ एक नया अध्याय शुरू हो गया है, जिसमें पार्टी के सबसे बड़ी पहचान रहा ‘जोड़ा फूल’ यानी घास पर दो फूल का सफर खत्म होता दिख रहा है। 17 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश में ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और उसके आरक्षित ‘Flowers and Grass’ चुनाव चिह्न के इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। इसके बाद 18 सितंबर को आयोग ने दोनों गुटों को अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न आवंटित कर दिए।
ममता बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट को ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘Football Player’ चुनाव चिह्न मिला है। वहीं अरूप राय के नेतृत्व वाले बागी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और ‘लिफाफा’ चुनाव चिह्न आवंटित किया गया है। यह व्यवस्था फिलहाल अंतरिम है और चुनाव आयोग के सामने पार्टी के नाम और मूल चुनाव चिह्न को लेकर अंतिम फैसला अभी बाकी है।
लेकिन इस नई व्यवस्था के बीच सबसे ज्यादा चर्चा उस ‘जोड़ा फूल’ की हो रही है, जो करीब 28 वर्षों तक तृणमूल कांग्रेस की चुनावी पहचान रहा।
ममता बनर्जी ने खुद बनाया था ‘जोड़ाफूल’
तृणमूल कांग्रेस की स्थापना 1 जनवरी 1998 को हुई थी। पार्टी के आधिकारिक इतिहास के मुताबिक, उसी समय ममता बनर्जी ने पार्टी का लोगो खुद स्केच किया था। इसमें घास पर दो पौधे या फूल दिखाई देते हैं, जिसे बाद में तृणमूल कांग्रेस के चुनाव चिह्न के रूप में पहचान मिली।
पुरानी रिपोर्टों में भी यह उल्लेख मिलता है कि ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के कार्यालय में ही इस प्रतीक का स्केच तैयार किया था। दो फूल और घास का यह डिजाइन बाद में पार्टी की सबसे मजबूत चुनावी पहचान बन गया।
यानी जिस प्रतीक को आज करोड़ों मतदाता तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी से जोड़कर देखते हैं, उसकी शुरुआत किसी डिजाइन एजेंसी से नहीं, बल्कि खुद पार्टी संस्थापक के बनाए एक साधारण से स्केच से हुई थी।
‘तृणमूल’ नाम और ‘घास के फूल’ का कनेक्शन’
तृणमूल’ का अर्थ ही जमीनी स्तर या grassroots से जुड़ा है। ऐसे में घास से निकलते दो फूल पार्टी के नाम और उसकी राजनीतिक पहचान के साथ स्वाभाविक रूप से जुड़ गए।
तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक विवरण के अनुसार, इस प्रतीक के पीछे ममता बनर्जी का विचार केवल जमीनी राजनीति तक सीमित नहीं था। उन्होंने इसे सांप्रदायिक सद्भाव और एकता के संदेश से भी जोड़ा था। पार्टी के मुताबिक, दो कलियों के जरिए हिंदू-मुस्लिम एकता का संदेश देने की कल्पना की गई थी।
इसी वजह से ‘जोड़ाफूल’ धीरे-धीरे सिर्फ एक चुनावी निशान नहीं रहा। बंगाल की राजनीति में यह तृणमूल कांग्रेस की पहचान का पर्याय बन गया।
1998 से 2026 तक कैसे बना ‘जोड़ाफूल’ पहचान
1998 में तृणमूल कांग्रेस के गठन के बाद ‘जोड़ाफूल’ पार्टी के साथ लगातार जुड़ा रहा। समय के साथ पार्टी का राजनीतिक विस्तार हुआ और पश्चिम बंगाल की सत्ता तक पहुंचने के बाद यह प्रतीक और ज्यादा मजबूत चुनावी पहचान बन गया।
2011 में तृणमूल कांग्रेस ने पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के लंबे शासन को समाप्त कर सत्ता हासिल की। इसके बाद ‘जोड़ाफूल’ राज्य की राजनीति में सत्ता पक्ष की सबसे प्रमुख चुनावी पहचान में शामिल हो गया।
2019 में पार्टी ने अपने लोगो के इस्तेमाल में बदलाव भी किया और ‘कांग्रेस’ शब्द को लोगो से हटाकर ‘Trinamool’ पर ज्यादा जोर दिया, हालांकि चुनाव आयोग में पार्टी का नाम तृणमूल कांग्रेस ही रहा।
28 साल बाद क्यों फ्रीज हुआ ‘जोड़ाफूल’?
2026 में तृणमूल कांग्रेस के भीतर संगठनात्मक विवाद खुलकर सामने आया। दोनों पक्षों ने पार्टी के नाम, संगठन और चुनाव चिह्न पर अपना दावा पेश किया। मामला चुनाव आयोग तक पहुंचा।17 सितंबर को आयोग ने कहा कि उसके सामने दो प्रतिद्वंद्वी समूह हैं और दोनों खुद को ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस बता रहे हैं। अंतिम निर्णय के लिए चुनाव चिह्न आदेश, 1968 के पैराग्राफ 15 के तहत प्रक्रिया की जरूरत है।
आगामी उपचुनावों की समयसीमा को देखते हुए आयोग ने अंतरिम व्यवस्था के तहत दोनों पक्षों को मूल पार्टी नाम और ‘Flowers and Grass’ प्रतीक इस्तेमाल करने से रोक दिया।
इसके बाद दोनों गुटों से वैकल्पिक नाम और चुनाव चिह्न के विकल्प मांगे गए।
अब ‘जोड़ाफूल’ की जगह दिखेंगे नए सिंबल
18 सितंबर को चुनाव आयोग ने ममता बनर्जी के गुट को ‘Mamata All India Trinamool Congress’ नाम के साथ ‘Football Player’ सिंबल दिया।
दूसरे गुट को ‘Democratic Trinamool Congress’ नाम और ‘Envelope’ सिंबल मिला।
इसका मतलब यह है कि आगामी उपचुनावों में मतदाताओं को EVM पर तृणमूल कांग्रेस का पुराना नाम और ‘जोड़ाफूल’ वाला प्रतीक दिखाई नहीं देगा। फिलहाल दोनों गुट अलग-अलग नाम और चुनाव चिह्न के साथ मैदान में होंगे।
क्या ‘जोड़ाफूल’ हमेशा के लिए खत्म हो गया?
ऐसा कहना अभी जल्दबाजी होगी। चुनाव आयोग ने फिलहाल अंतरिम व्यवस्था के तहत पुराने नाम और प्रतीक के इस्तेमाल पर रोक लगाई है। पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर अंतिम फैसला अभी आयोग की आगे की प्रक्रिया के बाद होना है।
इसलिए ‘जोड़ाफूल’ की कहानी फिलहाल खत्म नहीं हुई है। लेकिन 1998 में ममता बनर्जी के हाथों बने उस साधारण से स्केच ने जिस राजनीतिक पहचान को करीब तीन दशक तक ढोया, 2026 में पहली बार वह बंगाल के चुनावी मैदान से अस्थायी रूप से बाहर हो गया है।
यही वजह है कि तृणमूल कांग्रेस के लिए यह सिर्फ चुनाव चिह्न बदलने की कहानी नहीं, बल्कि उसकी राजनीतिक पहचान के एक बेहद महत्वपूर्ण अध्याय के बदलने की कहानी भी है।
